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डिलीवरी के लिए अस्पतालों के चक्कर काटती रही आदिवासी महिला

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पालघर (महाराष्ट्र): एक ओर जहां पूरा देश अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) पर महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे कर रहा है और नारी शक्ति का उत्सव मना रहा है, वहीं महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल जिले पालघर से सिस्टम को शर्मसार करने वाली तस्वीर सामने आई है. एक गर्भवती आदिवासी महिला को प्रसव (डिलीवरी) के लिए तीन घंटा तक अस्पताल-अस्पताल भटकना पड़ा. मामले में जांच के आदेश दिए गए हैं.

वडकुन की एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता शोभा माछी को आधी रात को उसी गांव की एक गर्भवती महिला के प्रसव के संबंध में फोन आया. वह तुरंत उसे लेकर डहाणू के कॉटेज अस्पताल पहुंचीं. लेकिन वहां उन्हें बताया गया कि सामान्य प्रसव नहीं हो पाएगा, इसलिए वे महिला को तुरंत किसी दूसरे अस्पताल ले जाएं. जब उन्होंने एम्बुलेंस मांगी, तो उनसे कहा गया कि एम्बुलेंस आने में दो से तीन घंटे लगेंगे. मजबूरी में शोभा माछी उस महिला को लेकर निजी अस्पतालों की ओर भागीं. इस दौरान इलाज के अभाव में वह महिला तीन घंटे तक तड़पती रही.

“जानकारी मिली है कि जब महिला को डहाणू कॉटेज अस्पताल में भर्ती कराया गया, तब वहां अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर नियुक्त स्त्री रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं थे. इस संबंध में अस्पताल अधीक्षक से रिपोर्ट मांगी गई है. बुलाए जाने पर भी डॉक्टर ने आने से क्यों मना किया, हमने उनसे स्पष्टीकरण मांगा है और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी.”- डॉ. रामदास मराड, जिला शल्य चिकित्सक, पालघर

भाजपा विधायक चित्रा वाघ ने ‘ईटीवी भारत’ से बात करते हुए कहा, “मुझे डहाणू उप-जिला अस्पताल के इस गंभीर मामले की जानकारी आप लोगों से मिली है. एक गर्भवती महिला को प्रसव (डिलीवरी) के लिए मना करना बहुत ही गंभीर बात है. मैंने जिला शल्य चिकित्सक से संपर्क कर जानकारी ली है. मैं पालघर जिले की स्वास्थ्य सुविधाओं और ऐसी गंभीर घटनाओं के बारे में तुरंत स्वास्थ्य मंत्री से चर्चा करूंगी.”

“समय पर डॉक्टर और सुविधाएं न मिलने के कारण गरीब लोग निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर हैं. लेकिन एक गरीब व्यक्ति निजी अस्पताल में इलाज के लिए जरूरी पचास हजार से एक लाख रुपये कहां से लाएगा? अगर यह स्थिति नहीं बदली, तो ऐसी घटनाएं बार-बार होती रहेंगी और महिलाओं को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.” –शोभा माछी, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, वडकुन

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