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करियर तैयारी अब विकल्प नहीं: डॉ. संजीव सिन्हा के मॉडल ने बदली राष्ट्रीय शिक्षा बहस

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भारत की नई शिक्षा सोच अब केवल पाठ्यक्रम सुधार तक सीमित नहीं रह गई है। डॉ. संजीव सिन्हा द्वारा प्रस्तुत “स्कूल के साथ करियर तैयारी” मॉडल ने शिक्षा सुधार की दिशा को एक नया आयाम दिया है, जिस पर केंद्र सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। यह मॉडल स्कूली शिक्षा, करियर मार्गदर्शन और कौशल विकास को एकीकृत करने की व्यावहारिक रूपरेखा प्रस्तुत करता है।

इस पहल से छात्रों में करियर को लेकर स्पष्ट दृष्टि विकसित हो रही है, वहीं अभिभावकों को आर्थिक और मानसिक राहत मिल रही है। डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन लर्निंग और नैतिक मूल्यों के समावेश के कारण यह मॉडल भविष्य की शिक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहल भारत की शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी, सुलभ और रोजगार-उन्मुख बनाने में निर्णायक साबित हो सकती है।

डॉ संजीव सिन्हा की पहल रंग लाई

“स्कूल के साथ साथ करियर की तैयारी” शिक्षा मॉडल पर केंद्र सरकार के स्तर पर गंभीर मंथन

डॉ. संजीव सिन्हा:
— भारत की नई शिक्षा सोच का चेहरा

स्कूलिंग के साथ करियर तैयारी: अब विकल्प नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय अनिवार्यता
डॉ. संजीव सिन्हा के शिक्षा सुधार मॉडल पर केंद्र सरकार के स्तर पर गंभीर मंथन
तेज़ी से बदलती तकनीक, रूपांतरित होते रोजगार बाज़ार और बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के युग में भारत की शिक्षा प्रणाली आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यह पारंपरिक धारणा कि करियर की तैयारी स्कूल के बाद शुरू होती है, 21वीं सदी की आवश्यकताओं के सामने अब अपर्याप्त सिद्ध हो रही है।

आज एक नया राष्ट्रीय विमर्श उभर रहा है—
कि करियर की तैयारी स्कूल शिक्षा के भीतर ही शुरू होनी चाहिए।

इसी परिवर्तनशील विमर्श के केंद्र में हैं भारत के प्रख्यात शिक्षा सुधारक डॉ. संजीव सिन्हा, जिनका “स्कूल + करियर एकीकृत शिक्षा मॉडल” अब केंद्र सरकार के सर्वोच्च नीति स्तर पर गंभीर विचार-विमर्श का विषय बन चुका है।

कक्षा से कैबिनेट तक
पिछले एक वर्ष में डॉ. सिन्हा के इस मॉडल को दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के अनेक स्कूलों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया, जिसके परिणाम अत्यंत उत्साहजनक और मापनीय रहे।

छात्रों में देखा गया:

शैक्षणिक प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार

करियर को लेकर स्पष्ट दिशा

आत्मविश्वास में वृद्धि

अभिभावकों ने अनुभव किया:

मानसिक तनाव में कमी

आर्थिक बोझ में राहत

बच्चों की शिक्षा में अधिक सक्रिय सहभागिता

इन ठोस परिणामों ने नीति-निर्माताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या इस मॉडल को भारत की राष्ट्रीय शिक्षा सुधार नीति में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

एक ऐतिहासिक दर्शन
इस पहल को ऐतिहासिक बनाता है केवल इसका पैमाना नहीं, बल्कि इसके पीछे का दर्शन—

कि स्कूल शिक्षा और करियर निर्माण दो अलग यात्राएँ नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया हैं।
और इस प्रक्रिया के केंद्र में है चरित्र निर्माण।

डॉ. सिन्हा का स्पष्ट आग्रह है कि करियर तैयारी, नैतिक निर्माण के साथ-साथ चले:

“ईमानदारी की शपथ लें।
स्कूल के साथ करियर की तैयारी करें।
ईमानदार पेशेवर बनें।
राष्ट्र निर्माण करें।”

जमीनी अनुभव से जन्मी दृष्टि
डॉ. सिन्हा की यह सोच केवल सैद्धांतिक नहीं है।
झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में सैकड़ों सेमिनार, कार्यशालाएँ और संवादों के माध्यम से एक निष्कर्ष उभरकर सामने आया—

“यदि पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति और करियर की नींव स्कूल स्तर पर ही एकीकृत कर दी जाए, तो हर स्कूल एक ‘करियर-रेडी कैंपस’ बन सकता है।”

यह दृष्टि दशकों से चली आ रही उस संरचनात्मक खाई को चुनौती देती है जिसने स्कूली शिक्षा और पेशेवर तैयारी को अलग-अलग कर दिया था—और जिसके कारण कोचिंग उद्योग, तनाव और भ्रम का विस्तार हुआ।

सरकार के समक्ष प्रस्तावित प्रमुख सुधार
डॉ. सिन्हा का मॉडल व्यावहारिक, स्केलेबल और समावेशी रोडमैप प्रस्तुत करता है:

पाठ्यक्रम पुनर्गठन, जिससे स्कूल शिक्षा और प्रतियोगी/करियर तैयारी एक ही अकादमिक धारा में समाहित हो सके

स्कूल परिसर के भीतर करियर फाउंडेशन प्रोग्राम, बाहरी कोचिंग पर निर्भरता समाप्त करने हेतु

सांध्यकालीन ऑनलाइन लर्निंग मॉड्यूल, जिससे पढ़ाई, परिवार और मानसिक संतुलन बना रहे

वैज्ञानिक करियर काउंसलिंग, योग्यता, व्यक्तित्व और वैश्विक अवसरों के आधार पर

नौकरी खोजने वालों के बजाय नौकरी सृजक तैयार करना, उद्यमिता और नवाचार की सोच को प्रारंभिक स्तर से विकसित करना

डिजिटल शिक्षा और पर्यावरण का संगम
इस मॉडल का एक विशिष्ट स्तंभ है ऑनलाइन और डिजिटल शिक्षा का प्रबल समर्थन।

डॉ. सिन्हा शिक्षा सुधार को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हैं:

“ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा दें।
पीडीएफ और डिजिटल कंटेंट अपनाएँ।
काग़ज़ कम करें। पेड़ बचाएँ।
शिक्षा को छात्रों का ही नहीं, धरती का भविष्य भी सुरक्षित करना चाहिए।”

यहाँ ई-एजुकेशन, इको-एजुकेशन बन जाती है।

व्यापक सामाजिक प्रभाव
शैक्षणिक सुधार से आगे बढ़कर, यह मॉडल गहरे सामाजिक परिवर्तन की संभावना रखता है:

किशोरों में तनाव और मानसिक दबाव में तीव्र कमी

अनियंत्रित और महंगे कोचिंग बाज़ार पर निर्भरता में गिरावट

मध्यम वर्ग और ग्रामीण परिवारों को आर्थिक राहत

ऑनलाइन होम-लर्निंग से पारिवारिक संबंधों में मजबूती

माता-पिता और बच्चों के बीच बेहतर संवाद

JEE-NEET से परे विविध करियर विकल्पों से परिचय

प्रारंभिक लक्ष्य निर्धारण, ड्रॉपआउट और वर्षों की बर्बादी में कमी

यह मॉडल शिक्षा को फिर से मानव विकास की प्रक्रिया के रूप में स्थापित करता है, केवल परीक्षा उत्पादन प्रणाली के रूप में नहीं।

डॉ. संजीव सिन्हा: शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का माध्यम
डॉ. सिन्हा के लिए यह सुधार केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत परियोजना है।

“यदि भारत को आत्मनिर्भर और वैश्विक प्रतिस्पर्धी बनना है,
तो शिक्षा को परीक्षा-केंद्रित सोच से आगे बढ़कर
करियर-केंद्रित और जीवन-कौशल आधारित बनाना होगा।
स्कूल स्तर पर स्पष्ट करियर दिशा अब विकल्प नहीं, समय की मांग है।”

उनका दर्शन एक सरल लेकिन शक्तिशाली शृंखला में व्यक्त होता है:

स्कूल से शुरुआत।
करियर की तैयारी।
ईमानदारी की शपथ।
डिजिटल शिक्षा।
पर्यावरण संरक्षण।
ईमानदार राष्ट्र निर्माता।

एक राष्ट्रीय विकल्प का क्षण
आज जब भारत स्वयं को भविष्य का वैश्विक नेता बनाने की दिशा में अग्रसर है, तो प्रश्न यह नहीं रह गया है कि सुधार चाहिए या नहीं, बल्कि—

कितनी साहसिकता और कितनी शीघ्रता से इसे लागू किया जाए।

यदि यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जाता है, तो आने वाले वर्षों में इतिहासकार संभवतः इस क्षण को उस बिंदु के रूप में देखेंगे जब भारत ने यह तय किया कि—

“स्कूल में करियर तैयारी कोई विकल्प नहीं थी।
यह भारत की राष्ट्रीय अनिवार्यता थी।”

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